एक सच्ची कहानी से शुरुआत करते हैं ........
स्पेन की एक मुहिम: “Clothes Have No Gender” नामक Campaign का नाम सुना है आपने? WhatsApp University के बेबुनियाद ज्ञान और कुतर्कों से थोड़ा ऊपर उठ कर सच तलाशने की कोशिश करेंगे तो हमें पता चलेगा कि – कुछ वर्ष पहले 27, October 2020 को स्पेन के एक शहर Bilbao में एक पुरुष छात्र को स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था क्योंकि उसने स्कर्ट (Skirt) (मान्यता के आधार पर महिला के कपड़े) पहन कर स्कूल में दाखिल हो गया था.
स्कूल से निकाले गए उस छात्र के समर्थन में स्कूल के आधे से अधिक छात्र भी स्कर्ट (Skirt) पहन कर स्कूल आ गए. हद तो तब हो गयी जब स्कूल के एक पुरुष शिक्षक ने भी स्कर्ट (Skirt) पहन कर उस छात्र के समर्थन में उतर गए और स्कूल प्रशासन का विरोध करने लगे. देखते ही देखते “Clothes Have No Gender” नामक मुहिम (Campaign) की शुरुआत पूरे स्पेन में होने लगी और इसका समर्थन इंग्लैंड के सड़कों पर भी दिखने लगा.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समान नागरिक संहिता
लड़कों द्वारा स्कर्ट पहनने की घटना पर वहाँ रहने वाले अन्य किसी समुदाय के लड़कों ने स्कर्ट पहनने का न तो समर्थन किया और न ही स्कूल प्रशासन की तरफ़दारी करते हुए ‘समान नागरिक संहिता’ एवं नियमों का हवाला देने में जुट गए ।
हिजाब विवाद और निजी स्वतंत्रता
परंतु धर्मनिरपेक्षता / पंथनिरपेक्षता को अपने संविधान की प्रस्तावना (आत्मा) में लिखने वाले देश स्कूल के क्लास से लेकर सड़क एवं सेमिनारों तक हिजाब के विरोध में न केवल नारेबाजी करते हैं बल्कि इसे लड़कियों के पिछड़ापन से जोड़ने की पुरज़ोर कोशिश में सड़क से लेकर टीवी स्क्रीन तक चिल्लाते रहते हैं ।
धार्मिक कट्टरता का प्रभाव और युवा वर्ग
नकारात्मकता की पराकाष्ठा को पीछे छोड़ते हुए हमारे देश में हिजाब के विरोध को लेकर भगवा गमछा लहराया तो किसी ने धार्मिक नारे के सहारे सामने वाले को डराने और धमकाने की कोशिश की । हमारे देश को भगवा गमछे या धार्मिक नारे से दिक्कत नहीं है मगर वो गमछे और नारे इच्छा से नहीं बल्कि किसी को डराने धमकाने और किसी की निजी स्वतंत्रता को समाप्त करने के लिए लगाए गए थे, जो व्यक्ति विरोधी होने के साथ-साथ नैतिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से भी इस देश के विरोधी हैं.
जो युवा उन्माद में अंधे होकर, भगवा लगा कर हिजाब का विरोध करते फिरते हैं, उनके माता-पिता को भले ही आज अपने बच्चों पर गर्व हो रहा होगा, पर उन अभिभावकों ने अपनी अगली पीढ़ी को धार्मिक कट्टरता का स्वाद बड़ी ही खूबसूरती से ट्रांसफर कर दिया है. उन्हें लगता है कि - उनके बच्चे देश बदलने का साहसिक कार्य कर रहे हैं, पर वो भूल रहे हैं कि – WhatsApp यूनिवर्सिटी के कुतर्कों से उनके बच्चों के व्यवहार में जो ज़हर घोला जा रहा है, उसका डंक पलटकर उन्हें ही मिलेगा और उसका दंश पूरे देश को झेलना होगा ।
लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान के नियम
हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है जो संविधान के नियमों से चलता है, जिसमें क़ानून बनाने और उसमें सुधार करने के लिए जनता अपने वोट के ताक़त से विधायिका को चुनती है. उस क़ानून के आधार पर दोषी को सज़ा सुनाने या निर्दोष को न्याय देने का फ़ैसला न्यायपालिका करती है, और उस फ़ैसले को ज़मीनी स्तर पर लागु करने का कार्य की ज़िम्मेदारी कार्यपालिका के हाथों में होती है ।
धर्मतंत्र बनाम लोकतंत्र: युवा ऊर्जा की दिशा
हमारे देश में धर्म के नाम पर कुछ तथाकथित ठेकेदारों ने धर्मतंत्र, भीड़तंत्र, अराजकतंत्र, मनमानीतंत्र के माध्यम से लोकतंत्र की जड़ों को लगातार हिलाने का प्रयास कर रहे हैं, और इस प्रयास के लिए उन सफ़ेदपोश गुंडों ने देश के कर्मठ युवाओं को चुना है. इनकी कर्मठता को नकारात्मकता की तरफ़ ले जाने के लिए कभी धर्म, फ़र्ज़ी राष्ट्रभक्ति, जाति, संप्रदाय तो कभी क्षेत्रीयता का ज़हर घोलते रहते हैं. कहीं ऐसा न हो, देश के युवाओं की ऊर्जा को ग़लत दिशा देने वाले मुल्क केवल राजनीतिक जुमलों में ही विश्वगुरु के सपने संजो रहा हो.
दोहरे मापदंड और नफ़रत की राजनीति
नफ़रत की राजनीती :- (Politics of hate will turn our children towards crime)
इस देश के युवाओं को इस तरह दिग्भ्रमित (Astray) किया जा रहा है कि - यदि किसी पंजाबी सरदार जी की पगड़ी का अपमान किसी अन्य देश या फिल्म में भी होता है तो सारा देश इसे देश की इज्ज़त और अस्मिता से जोड़ कर एक साथ आवाज उठाते हैं. सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना एवं सरस्वती पूजा होने में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को किनारे रख कर इसे आस्था से जोड़ कर देखा जाता है पर मुसलमान स्कूल एवं कॉलेज जाती हुई लड़की के हिजाब लगा लेने से देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों को दिक्कत होने लगती है. इसी देश में दिगंबर जैन बिना वस्त्र के रह सकते हैं, श्वेतांबर जैन पूरी ज़िंदगी सफ़ेद कपड़े में रह सकते हैं, योगी आदित्यनाथ भगवा वस्त्र में राज्य का सबसे सर्वोच्च संवैधानिक पद संभाल सकते हैं, बस मुसलमान लड़की हिज़ाब नहीं पहन सकती है.
राहत इंदौरी साहब की पंक्तियाँ
अगर किसी को लगता है कि - नफ़रत की राजनीती और युवाओं के दिमाग़ में ज़हर घोलने से किसी एक समुदाय, संप्रदाय या धर्म के युवा बर्बाद हो जाएँगे तो उन्हें रुक कर, ठहर कर पुनर्विचार करते हुए ‘राहत-इंदौरी साहब’ की इस दो पंक्ति को बार-बार पढ़ना चाहिए ।
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में,
यहाँ पे सिर्फ हमारा मकाँ थोड़ी है.......
